
नई दिल्ली, 13 मार्च। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था में आ रही रुकावटों का असर अब भारत की रसोई और छोटे कारोबारों तक दिखाई देने लगा है। कई राज्यों में रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की खबरें सामने आ रही हैं। खासतौर पर व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कमी के कारण होटल, रेस्तरां और सड़क किनारे ठेला लगाने वाले छोटे कारोबारियों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई जगहों पर कारोबार लगभग ठप पड़ गया है, जबकि कई लोग मजबूरी में कोयले और लकड़ी के चूल्हों का सहारा लेकर किसी तरह अपना काम जारी रखे हुए हैं।
बताया जा रहा है कि गैस की सप्लाई में आई अनियमितता का सबसे ज्यादा असर छोटे व्यापारियों पर पड़ा है। ऐसे लोग जिनका रोज़ का खर्च और परिवार की आजीविका छोटे-मोटे व्यवसायों पर निर्भर है, उनके सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। गुजरात के अहमदाबाद में अंडा ठेला लगाने वाले अरविंद महतो का कहना है कि गैस सिलेंडर समय पर न मिलने के कारण उनका काम लगभग रुक गया है। उनका कहना है कि पूरा परिवार इसी छोटे व्यवसाय पर निर्भर है। यदि कई दिनों तक गैस उपलब्ध नहीं होती, तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है।
इसी तरह कई अन्य छोटे विक्रेताओं ने भी बताया कि गैस की कमी के कारण उन्हें पारंपरिक ईंधन का सहारा लेना पड़ रहा है। कोयले और लकड़ी के चूल्हों पर खाना बनाने में समय ज्यादा लगता है, जिससे काम की रफ्तार धीमी हो जाती है। साथ ही धुआं और अतिरिक्त मेहनत भी करनी पड़ती है। ऐसे में ग्राहकों की संख्या भी कम हो जाती है और आमदनी पर असर पड़ता है।

इस संकट के बीच गैस सिलेंडरों की कीमतों को लेकर भी चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है। व्यापारियों के अनुसार पहले जहां व्यावसायिक गैस सिलेंडर लगभग 1600 से 1800 रुपये के बीच मिल जाता था, वहीं अब कुछ जगहों पर इसकी कीमत 3000 से 4500 रुपये तक पहुंच गई है। अनौपचारिक बाजार में इतनी ऊंची कीमत चुकाकर गैस खरीदना छोटे कारोबारियों के लिए लगभग असंभव हो गया है। इसी कारण कई लोग मजबूरी में कोयले और लकड़ी जैसे पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट रहे हैं।
गैस संकट के बीच कई ढाबों और छोटे होटलों में फिर से कोयले के चूल्हे दिखाई देने लगे हैं। हालांकि इन चूल्हों पर खाना बनने में अधिक समय लगता है, लेकिन मौजूदा हालात में यही विकल्प कारोबारियों को अपना काम बंद होने से बचाने में मदद कर रहा है। कई व्यापारी बताते हैं कि यदि गैस की स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो उन्हें पूरी तरह पारंपरिक ईंधन पर निर्भर होना पड़ सकता है।
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों में बाधा के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए वैश्विक परिस्थितियों का असर यहां जल्दी दिखाई देता है। ऐसे समय में कोयला एक महत्वपूर्ण बैक-अप ऊर्जा स्रोत के रूप में सामने आता है।
भारत में बिजली उत्पादन से लेकर कई उद्योगों तक कोयला लंबे समय से ऊर्जा का प्रमुख आधार रहा है। संकट के समय यह न केवल बड़े उद्योगों बल्कि छोटे कारोबारों के लिए भी एक विकल्प प्रदान करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए देश को विभिन्न ऊर्जा स्रोतों के संतुलित उपयोग पर ध्यान देना होगा।

उनका कहना है कि आने वाले समय में कोयला, गैस, तेल और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे स्रोतों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। जब किसी एक स्रोत की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो अन्य विकल्प ही देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
फिलहाल छोटे व्यापारी, होटल संचालक और आम लोग यही उम्मीद कर रहे हैं कि गैस की आपूर्ति जल्द सामान्य हो जाएगी। हालांकि मौजूदा हालात ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए विविध स्रोतों का होना जरूरी है और संकट के समय कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
Author: Khabri Chai
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