नई दिल्ली, 29 सितंबर 2026। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में निर्वाचन आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) से जुड़े फैसलों को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। दिल्ली के अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर याचिका में आयोग के कुछ फैसलों, दिशा-निर्देशों और चुनावी डेटाबेस में किए गए कथित बदलावों की वैधता पर सवाल उठाए गए हैं।

SIR से जुड़े फैसले और मतदाता सूची पर उठे सवाल
याचिका का प्रमुख फोकस मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) से जुड़े निर्णयों पर है। इसमें निर्वाचन आयोग के ECINet और ERONet जैसे चुनावी डेटाबेस और सिस्टम में कथित बदलावों की जांच की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से Form-6 से जुड़ी प्रक्रिया में कथित बदलावों का मुद्दा उठाया है। Form-6 का इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। याचिका में कथित तौर पर ऐसे बदलावों को चुनौती दी गई है, जिनमें आवेदकों से अतिरिक्त जानकारी या पिछले SIR से संबंधित विवरण मांगे जाने का मुद्दा शामिल है।
याचिका में पुराने वैधानिक Form-6 को बहाल करने की मांग भी रखी गई है।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का भी जिक्र
यह मामला ऐसे समय सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है जब निर्वाचन आयोग के भीतर SIR और मतदाता सूची से संबंधित कुछ प्रक्रियाओं को लेकर दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई है।
Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इनमें कुछ ऐसे फैसले भी थे जिन्हें दोनों अधिकारियों ने अपनी जानकारी या सहमति के बिना जारी किए जाने की बात कही थी।
इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि आयोग के सभी फैसले, जिसमें SIR भी शामिल है, तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
ECINet और ERONet की फॉरेंसिक जांच की मांग
याचिका में चुनावी डेटा से जुड़े सिस्टम की तकनीकी जांच की मांग भी की गई है। इसमें ECINet और ERONet डेटाबेस का फॉरेंसिक ऑडिट कराने की मांग शामिल है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि SIR से जुड़े डेटा और प्रक्रियाओं में हुए कथित बदलावों की स्वतंत्र तकनीकी जांच जरूरी है। याचिका में रिकॉर्ड, डिजिटल लॉग और संबंधित तकनीकी प्रक्रियाओं की जांच कराने की मांग भी रखी गई है।
रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में जांच की मांग
याचिका में पूरे मामले की स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग या SIT गठित करने का अनुरोध किया गया है।
याचिकाकर्ता ने आरोपों की तकनीकी, फॉरेंसिक और प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग की है। इसके अलावा, याचिका में Representation of the People Act, 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज करने और जांच के बाद यदि किसी अधिकारी की जिम्मेदारी सामने आती है तो अभियोजन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए निर्देश देने की मांग भी की गई है।
CEC समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग
याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार के अलावा निर्वाचन आयोग के कुछ अन्य अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई है। इसमें आरोपों की जांच के बाद जिम्मेदारी तय करने और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई का अनुरोध किया गया है।
हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों को अभी न्यायिक रूप से सही ठहराया नहीं गया है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल होना अपने आप में आरोपों की पुष्टि नहीं माना जाता।
विवाद के बीच आयोग ने उठाए कुछ कदम
इस पूरे विवाद के बीच 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी के बीच बैठक हुई। इसके बाद मतदाता पंजीकरण फॉर्म, चुनावी डेटाबेस तक पहुंच और आयोग की IT व्यवस्था से जुड़े कुछ मुद्दों पर फैसले लिए गए।
इससे स्पष्ट है कि SIR और चुनावी डेटा से जुड़े मुद्दे अब केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निर्वाचन आयोग के आंतरिक कामकाज और न्यायिक जांच से जुड़े सवाल भी उठ रहे हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर नजर
फिलहाल इस मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि याचिका में लगाए गए आरोपों पर अदालत किस तरह विचार करती है और निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड तथा निर्णय प्रक्रिया को लेकर क्या निर्देश दिए जाते हैं।
एक तरफ याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर एकतरफा फैसलों और तकनीकी बदलावों की स्वतंत्र जांच की मांग की है, वहीं निर्वाचन आयोग का कहना है कि SIR समेत उसके फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए।
अब आगे की न्यायिक कार्यवाही में इन दावों और आयोग के आधिकारिक पक्ष की कानूनी जांच महत्वपूर्ण होगी।
Author: Khabri Chai
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