जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाए जाने वाले विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय दशहरा पर्व की प्रमुख परंपराओं में शामिल भीतर रैनी की रस्म बुधवार देर रात निभाई गई। इस अनुष्ठान में आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया जाता है। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के छत्र से जुड़ी इस रस्म में आदिवासी ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से रथ को लेकर कुम्हड़ाकोट के जंगल की ओर जाते हैं। इस अनोखी परंपरा को बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक माना जाता है।

क्या है भीतर रैनी की परंपरा?
बस्तर दशहरा की भीतर रैनी रस्म में आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ की परिक्रमा और उसे ले जाने की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु जुटते हैं। रथ को तैयार करने और खींचने में स्थानीय आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसे आम बोलचाल में रथ ‘चुराने’ की रस्म भी कहा जाता है। यह कोई सामान्य चोरी नहीं, बल्कि बस्तर की ऐतिहासिक लोकपरंपरा का प्रतीकात्मक हिस्सा है, जिसे पीढ़ियों से निभाया जाता रहा है।
राजा से नाराज ग्रामीणों ने रथ छिपाया था
स्थानीय मान्यता के अनुसार, राजशाही के दौर में माड़िया समुदाय के ग्रामीण राजा से नाराज होकर विजय रथ को अपने साथ ले गए थे और उसे कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा दिया था। इसके बाद राजा ग्रामीणों को मनाने के लिए वहां पहुंचे। उनके साथ मेल-मिलाप और नए चावल से बनी खीर खाने की परंपरा निभाई गई, जिसे ‘नवा खानी’ कहा जाता है।
इसके बाद रथ को वापस जगदलपुर लाया गया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में भीतर रैनी के बाद बाहर रैनी की रस्म निभाई जाती है। यह परंपरा राजा और ग्रामीणों के बीच संबंधों, संवाद और सामुदायिक सहभागिता की लोककथा से जुड़ी है।
कुम्हड़ाकोट के जंगल तक जाता है विजय रथ
भीतर रैनी के दौरान विजय रथ को कुम्हड़ाकोट की ओर ले जाया जाता है, जो दंतेश्वरी मंदिर से लगभग चार किलोमीटर दूर बताया जाता है। इस आयोजन में बड़ी संख्या में आदिवासी ग्रामीण शामिल होते हैं और रथ को खींचकर निर्धारित स्थान तक पहुंचाते हैं।
रथ की परिक्रमा और उससे जुड़ी रस्मों को देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं। बस्तर दशहरा की यह परंपरा क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है।
बाहर रैनी में वापस लौटेगा विजय रथ
भीतर रैनी के बाद गुरुवार को बाहर रैनी की रस्म निभाई जानी है। कार्यक्रम की जानकारी के अनुसार, बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव कुम्हड़ाकोट पहुंचकर ग्रामीणों के साथ नवा खानी की रस्म में शामिल होंगे। इसके बाद विजय रथ को वापस जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर की ओर लाया जाएगा।
इस रस्म के दौरान भी बड़ी संख्या में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के जुटने की संभावना रहती है। रथ को वापस लाने की परंपरा बस्तर दशहरा के प्रमुख अनुष्ठानों में से एक है।
बस्तर दशहरा सिर्फ पर्व नहीं, सांस्कृतिक विरासत
बस्तर दशहरा देश के अन्य क्षेत्रों में मनाए जाने वाले दशहरा पर्व से अपनी परंपराओं के कारण अलग पहचान रखता है। यहां इसका केंद्र मां दंतेश्वरी की आराधना, आदिवासी रीति-रिवाज और राजपरिवार से जुड़ी ऐतिहासिक परंपराएं हैं। करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में अनेक रस्में निभाई जाती हैं, जिनमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।
भीतर रैनी और बाहर रैनी जैसी परंपराएं बस्तर की सांस्कृतिक विविधता और सामुदायिक एकजुटता को सामने लाती हैं। यही वजह है कि हर साल इस आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जगदलपुर पहुंचते हैं।
Author: Khabri Chai
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