अल नीनो का बढ़ता खतरा! भारत में गर्म सर्दियों की आशंका, गेहूं की पैदावार पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली। भारत में आने वाली सर्दियों को लेकर मौसम और कृषि विशेषज्ञों की चिंताएं बढ़ रही हैं। प्रशांत महासागर में विकसित होने वाली जलवायु घटना अल नीनो का संभावित प्रभाव देश के तापमान, बारिश और कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। आशंका जताई जा रही है कि सर्दियों के दौरान देश के कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। यदि ऐसा होता है, तो गेहूं सहित रबी की फसलों पर इसका असर पड़ने की संभावना रहेगी।

अल नीनो से भारत में गर्म सर्दी का खतरा, गेहूं की फसल पर पड़ सकता है असर –  Environment Pulse

विश्व मौसम संगठन (WMO) और क्षेत्रीय जलवायु पूर्वानुमानों को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार, 2026 के अंतिम महीनों में अल नीनो की स्थिति मजबूत होने की आशंका जताई गई है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव कितना होगा और भारत के किन क्षेत्रों में मौसम किस तरह बदलेगा, यह आने वाले महीनों की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

क्या है अल नीनो, जो बदल सकता है मौसम का मिजाज?

अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसके दौरान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव हवाओं, वायुमंडलीय दबाव और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बारिश के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।

भारत में अल नीनो पर विशेष नजर रखी जाती है, क्योंकि इसके सक्रिय रहने पर दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ने का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, हर अल नीनो के दौरान भारत में सूखा पड़े या बारिश कम हो, यह जरूरी नहीं है। हिंद महासागर की स्थिति, अन्य जलवायु प्रणालियों और क्षेत्रीय मौसमी परिस्थितियों के कारण इसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है।

गर्म सर्दियां क्यों बढ़ा सकती हैं किसानों की चिंता?

भारत में सर्दियों का मौसम रबी फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। गेहूं की बुवाई से लेकर पौधों के विकास और दाने बनने तक तापमान की अहम भूमिका रहती है। यदि सर्दियों के अंतिम चरण में तापमान तेजी से बढ़ता है, तो गेहूं की फसल समय से पहले पक सकती है। इससे दानों के विकास के लिए उपलब्ध समय कम हो सकता है और उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है।

विशेष रूप से जनवरी और फरवरी के दौरान अधिक तापमान गेहूं की फसल के लिए चुनौती बन सकता है। हालांकि, नुकसान की वास्तविक मात्रा फसल की किस्म, बुवाई के समय, सिंचाई की उपलब्धता और स्थानीय मौसम पर निर्भर करेगी।

किसानों के लिए इस दौरान मौसम की जानकारी के आधार पर सिंचाई और फसल प्रबंधन की योजना बनाना महत्वपूर्ण होगा। कृषि विभाग की स्थानीय सलाह का पालन करने से संभावित मौसमी जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।

कम बारिश के बाद जल संसाधनों पर बढ़ सकता है दबाव

यदि मानसून के दौरान किसी क्षेत्र में बारिश कम हुई हो और सर्दियों में तापमान भी सामान्य से अधिक रहे, तो जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। जलाशयों में पानी की उपलब्धता, भूजल स्तर और फसलों की सिंचाई की जरूरतें इस स्थिति में महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

हालांकि, पूरे भारत में बारिश की स्थिति एक जैसी नहीं रहती। किसी क्षेत्र में सामान्य से कम बारिश हो सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा दर्ज की जा सकती है। इसलिए देशव्यापी निष्कर्ष निकालने के बजाय राज्य और जिले के स्तर पर बारिश तथा जल उपलब्धता के आंकड़ों को देखना जरूरी है।

दुनिया के कई हिस्सों में बदल सकता है मौसम

अल नीनो का असर भारत तक सीमित नहीं रहता। यह वैश्विक तापमान, वर्षा और तूफानों की गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में गर्म और शुष्क परिस्थितियों से सूखे तथा जंगलों में आग का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं, पूर्वी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की आशंका बढ़ सकती है।

प्रशांत और अटलांटिक महासागरों में उष्णकटिबंधीय तूफानों की गतिविधियों पर भी इसका अलग-अलग प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, इन क्षेत्रों में मौसम का अंतिम स्वरूप अन्य जलवायु कारकों पर भी निर्भर करता है।

छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए क्या है इसका मतलब?

छत्तीसगढ़ में भी रबी सीजन के दौरान तापमान, बारिश और सिंचाई की स्थिति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। प्रदेश के जिन क्षेत्रों में गेहूं और अन्य रबी फसलों की खेती होती है, वहां सर्दियों के तापमान में बदलाव फसल के विकास को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, अल नीनो के संभावित प्रभाव के आधार पर अभी यह कहना सही नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ में गेहूं की पैदावार निश्चित रूप से घटेगी। इसके लिए प्रदेश के क्षेत्रवार मौसम पूर्वानुमान, तापमान के आंकड़े, मिट्टी में नमी और सिंचाई की उपलब्धता का आकलन जरूरी होगा।

2027 तक क्यों महत्वपूर्ण रहेगा मौसम पर नजर रखना?

यदि अल नीनो का प्रभाव आने वाले महीनों में मजबूत रहता है, तो 2027 में भी तापमान और बारिश के पैटर्न पर नजर रखना जरूरी होगा। कृषि उत्पादन के साथ-साथ जल प्रबंधन, किसानों की बुवाई की योजना और फसलों की सिंचाई पर भी इसका असर पड़ सकता है।

फिलहाल गर्म सर्दियों और गेहूं की पैदावार में गिरावट को निश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता। मौसम संबंधी पूर्वानुमानों में बदलाव संभव है। आने वाले महीनों में तापमान, पश्चिमी विक्षोभ, बारिश और क्षेत्रीय परिस्थितियों के आंकड़े ही तस्वीर स्पष्ट करेंगे।

कुल मिलाकर, अल नीनो का संभावित प्रभाव भारत के मौसम और कृषि क्षेत्र के लिए सतर्क रहने का संकेत है। किसानों के लिए समय पर मौसम की जानकारी प्राप्त करना, स्थानीय कृषि सलाह का पालन करना और जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना महत्वपूर्ण रहेगा।

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Author: Khabri Chai

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