बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में नदियों से अवैध रेत उत्खनन के मामले में अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। अरपा नदी के नगाई घाट से रेत चोरी के मामले में विशेष न्यायालय ने आरोपी कुंवर सिंह कंवर को तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही उस पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। 28 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए इस फैसले में अदालत ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
मामले की खास बात अदालत की वह टिप्पणी रही, जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि जब प्राकृतिक संसाधन ही नष्ट हो जाएंगे, तब धन का क्या उपयोग रह जाएगा। अदालत ने एक प्रसिद्ध कहावत का उल्लेख करते हुए प्रकृति और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया।
क्या है अरपा नदी के रेत चोरी का मामला?
यह मामला बिलासपुर जिले में अरपा नदी के नगाई घाट से अवैध रूप से रेत उत्खनन और चोरी से जुड़ा है। आरोपी कुंवर सिंह कंवर के खिलाफ वर्ष 2025 में कोटा थाने में मामला दर्ज किया गया था। सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर विशेष न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी ने आरोपी को संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया।
अदालत ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 303(2), छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियम, 2015 के नियम 71 और खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की संबंधित धाराओं के तहत सजा सुनाई।
फैसले के तहत आरोपी को तीन साल का कठोर कारावास और 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
‘जब आखिरी मछली पकड़ ली जाएगी, तब समझ आएगी पैसे की कीमत’
फैसला सुनाते समय विशेष न्यायाधीश ने एक प्रसिद्ध कहावत का उल्लेख किया। इस कहावत का भाव है कि जब आखिरी पेड़ काट दिया जाएगा, आखिरी नदी प्रदूषित हो जाएगी और आखिरी मछली पकड़ ली जाएगी, तब इंसान को समझ आएगा कि पैसे को खाया नहीं जा सकता।
इस कथन के जरिए अदालत ने यह संदेश दिया कि प्राकृतिक संसाधनों को केवल आर्थिक लाभ के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। जंगल, नदियां, पेड़-पौधे और जलीय जीव मानव जीवन के लिए अनिवार्य हैं। इनके विनाश से होने वाली क्षति की भरपाई केवल पैसों से नहीं की जा सकती।
पर्यावरण संरक्षण पर भी अदालत ने जताई चिंता
फैसले में पोप फ्रांसिस के विचारों का भी उल्लेख किया गया। इसमें जैव विविधता के विनाश को प्रकृति की अखंडता के लिए गंभीर खतरे के रूप में रेखांकित किया गया।
नदियों से अवैध रेत उत्खनन का प्रभाव केवल खनिज संपदा की चोरी तक सीमित नहीं रहता। इससे नदी की तलहटी, प्राकृतिक प्रवाह, जलीय जीवों के आवास और आसपास के पर्यावरणीय संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।
यदि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अनियंत्रित तरीके से जारी रहता है, तो इसका नुकसान वर्तमान पीढ़ी के साथ आने वाली पीढ़ियों को भी उठाना पड़ सकता है। यही कारण है कि अवैध खनन को रोकना पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
अवैध खनन पर सख्ती का संदेश
अरपा नदी के नगाई घाट से जुड़े इस मामले में सुनाई गई सजा ने अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ कानून के पालन और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के महत्व को सामने रखा है। अदालत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि प्राकृतिक संपदा का संरक्षण केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के भविष्य से जुड़ा विषय भी है।
इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाकर कमाया गया धन पर्यावरण की क्षति की भरपाई नहीं कर सकता। नदी, जंगल और जैव विविधता की रक्षा करना आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जरूरी है।
Author: Khabri Chai
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