बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्कूली बच्चों को समय पर पाठ्यपुस्तकें नहीं मिलने का मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग में हलचल तेज हो गई है। हैरानी की बात यह है कि एक ओर कई स्कूलों में विद्यार्थी किताबों के अभाव में पढ़ाई करने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर गतोरी स्थित पाठ्य पुस्तक निगम के डिपो में करीब 7 लाख किताबें रखी हुई हैं। किताबें उपलब्ध होने के बावजूद विद्यार्थियों तक नहीं पहुंच पाने की स्थिति ने शिक्षा विभाग की वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले को लेकर प्रदेश के शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने नाराजगी जताई है। उन्होंने संयुक्त संचालक (जेडी) अश्वनी भारद्वाज से पूरे प्रकरण पर स्पष्टीकरण मांगा है। इसके अलावा बिल्हा और तखतपुर के विकासखंड शिक्षा अधिकारियों (बीईओ) को भी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
डिपो में रखी हैं लाखों किताबें, स्कूलों में कमी
जानकारी के अनुसार, बिलासपुर शहर से लगभग 14 किलोमीटर दूर गतोरी स्थित पाठ्य पुस्तक निगम के डिपो में करीब 7 लाख किताबें रखी हुई हैं। इसके बावजूद जिले के कई स्कूलों में विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकें नहीं मिल पाई हैं। डिपो में लंबे समय से रखी कुछ किताबों में सीलन आने की बात भी सामने आई है, जिससे उनके खराब होने की आशंका जताई जा रही है।
इस स्थिति ने सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब विद्यार्थियों के लिए किताबें उपलब्ध थीं, तो उनका वितरण समय पर क्यों नहीं किया गया? क्या वितरण की योजना में कमी रही या फिर विभागीय स्तर पर लापरवाही हुई? इन सवालों का जवाब जांच और अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
खबर सामने आने के बाद शिक्षा मंत्री ने मांगा जवाब
इस मामले से जुड़ी खबर 27 अक्टूबर को दैनिक भास्कर में प्रकाशित होने के बाद शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने नाराजगी जताई। उन्होंने संयुक्त संचालक अश्वनी भारद्वाज से स्पष्टीकरण मांगते हुए पूरे मामले की जानकारी देने को कहा है।
वहीं, बिल्हा और तखतपुर के बीईओ को भी अपने-अपने विकासखंड के स्कूलों की स्थिति की रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग यह पता लगाने में जुटा है कि किन स्कूलों में पाठ्यपुस्तकों की कमी है और कितने विद्यार्थी अब तक किताबों से वंचित हैं।
वितरण रजिस्टर की जांच, प्रधान पाठकों से मांगी जानकारी
किताबों के वितरण में हुई चूक का पता लगाने के लिए स्कूल स्तर पर जानकारी जुटाई जा रही है। दोनों विकासखंडों के बीईओ ने प्रधान पाठकों से रिपोर्ट मांगी है। संकुल समन्वयकों और प्राचार्यों के माध्यम से वितरण रजिस्टर की जांच भी की जा रही है।
इस प्रक्रिया के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि किताबों का वितरण किस स्तर पर रुका। जांच में परिवहन संबंधी समस्या, वितरण व्यवस्था में कमी, प्रशासनिक लापरवाही या किसी अन्य कारण की भूमिका सामने आ सकती है।
सरकारी संसाधनों के उपयोग पर भी उठे सवाल
एक तरफ बच्चों की पढ़ाई के लिए पाठ्यपुस्तकों की जरूरत है, तो दूसरी तरफ डिपो में लाखों किताबों का जमा रहना और उनके सीलन से खराब होने की आशंका सरकारी संसाधनों के उपयोग पर सवाल खड़े करती है। यदि किताबें समय पर स्कूलों तक पहुंचा दी जातीं, तो विद्यार्थियों को पढ़ाई में होने वाली परेशानी से बचाया जा सकता था।
समय पर पाठ्यपुस्तकें मिलना विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए बेहद जरूरी है। ऐसे में वितरण व्यवस्था में देरी का असर बच्चों की शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
जांच के बाद क्या होगी कार्रवाई?
फिलहाल शिक्षा विभाग की ओर से जानकारी जुटाई जा रही है और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में किताबों के वितरण में देरी की असल वजह क्या सामने आती है और इसके लिए किस स्तर पर जिम्मेदारी तय होती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब डिपो में करीब 7 लाख किताबें मौजूद थीं, तो स्कूली बच्चों को समय पर पाठ्यपुस्तकें क्यों नहीं मिलीं? अधिकारियों की रिपोर्ट और विभागीय जांच के बाद ही इस मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
Author: Khabri Chai
Khabri Chai news portal.




