नई दिल्ली। वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों के गायन को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अहम सुनवाई हुई। कर्नाटक संगीतकार टीएम कृष्णा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा। अदालत ने 1986 के बिजो इमैनुएल फैसले का संदर्भ देते हुए संकेत दिया कि धार्मिक आस्था या अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगीत न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने की। टीएम कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर पेश हुए। याचिका में 2026 में किए गए कानूनी बदलाव और केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों को चुनौती दी गई है।

क्या है विवाद?
याचिका में 2026 के Prevention of Insults to National Honour Act में किए गए संशोधन और वंदे मातरम् के गायन से जुड़े केंद्र के निर्देशों को चुनौती दी गई है। संशोधित प्रावधान में जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोकना या इसके गायन में जुटी सभा में व्यवधान डालना दंडनीय बनाया गया है और इसके लिए तीन साल तक की सजा का प्रावधान बताया गया है।
टीएम कृष्णा की ओर से दलील दी गई कि कानून में ‘राष्ट्रीय गीत’ की परिभाषा और उससे जुड़े दायित्वों को लेकर स्पष्टता जरूरी है। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि सभी छह अंतरों को अनिवार्य करने का प्रभाव धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता पर पड़ सकता है।
कोर्ट ने बिजो इमैनुएल फैसले का दिया संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के Bijoe Emmanuel फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि धार्मिक या अंतरात्मा संबंधी आपत्ति रखने वाले लोगों को केवल राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत न गाने के आधार पर आपराधिक परिणाम नहीं भुगतने चाहिए। उस पुराने मामले में धार्मिक मान्यता के कारण राष्ट्रगान नहीं गाने वाले बच्चों को संरक्षण दिया गया था, जबकि वे उसके सम्मान में खड़े रहे थे।
अदालत ने फिलहाल यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि वंदे मातरम् के कितने अंतरे गाए जाने चाहिए। इस स्तर पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है और मामले की आगे सुनवाई होगी।
‘नक्सली’ शब्द पर कोर्ट में तीखी बहस
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच ‘नक्सली’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर तीखी बहस भी हुई।
रिपोर्टों के मुताबिक, मुरलीधर ने कानून में बदलाव की प्रक्रिया और उसके औचित्य पर सवाल उठाते हुए इस शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई और इसे वापस लेने की मांग की। इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कानून संविधान के अनुसार बनाया जाता है, ‘नक्सलियों’ के तरीके से नहीं। उन्होंने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया और स्पष्ट किया कि उनका संदर्भ संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं करने वालों से था।
मामले में पीठ ने भी हस्तक्षेप किया। रिपोर्टों के अनुसार जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी से पैदा हुई अनावश्यक गर्मी और तनाव की ओर इशारा किया।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद अदालत याचिका में उठाए गए संवैधानिक और कानूनी सवालों पर आगे सुनवाई करेगी।
फिलहाल अदालत की टिप्पणी को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। मामला विचाराधीन है और वंदे मातरम् के गायन, कानूनी दंडात्मक प्रावधानों तथा धार्मिक एवं अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया बाकी है।
Author: Khabri Chai
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