रायपुर। छत्तीसगढ़ में अस्पतालों के खिलाफ शिकायत या ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज मामलों में सीधे कार्रवाई को लेकर डॉक्टरों में नाराजगी बढ़ रही है। इस मुद्दे पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और छत्तीसगढ़ हॉस्पिटल बोर्ड की संयुक्त आपातकालीन बैठक हुई। बैठक में चिकित्सकों ने अस्पतालों पर कार्रवाई से पहले मामले की निष्पक्ष और विशेषज्ञ चिकित्सकीय जांच कराने की मांग की।

डॉक्टरों का कहना है कि किसी शिकायत के आधार पर जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया का वे विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन अस्पताल या संबंधित डॉक्टर का पक्ष सुने बिना एकतरफा कार्रवाई उचित नहीं है। उनका कहना है कि चिकित्सा क्षेत्र में कई मामले ऐसे होते हैं, जहां मरीज की स्थिति बेहद गंभीर और अप्रत्याशित होती है। ऐसे मामलों में उपचार के दौरान आने वाली जटिलताओं को समझे बिना कार्रवाई होने से डॉक्टरों में भय का माहौल बन सकता है।
कार्रवाई से पहले विशेषज्ञ समिति से जांच की मांग
बैठक में IMA और हॉस्पिटल बोर्ड की ओर से मांग रखी गई कि किसी अस्पताल के खिलाफ शिकायत मिलने पर सीधे कार्रवाई करने के बजाय पहले विशेषज्ञ चिकित्सकीय समिति से मामले की जांच कराई जाए।
चिकित्सकों के अनुसार, इलाज के दौरान किसी मरीज की स्थिति बिगड़ने के पीछे कई चिकित्सकीय और परिस्थितिजन्य कारण हो सकते हैं। इसलिए शिकायत की जांच केवल दस्तावेजों या एक पक्ष की जानकारी के आधार पर नहीं होनी चाहिए।
संगठनों ने कहा कि जांच प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और कार्रवाई से पहले अस्पताल प्रबंधन तथा संबंधित डॉक्टरों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
डॉक्टरों में भय का माहौल, गंभीर मरीजों के इलाज पर असर की चिंता
चिकित्सकों ने बैठक में चिंता जताई कि यदि हर शिकायत के बाद बिना विशेषज्ञ जांच के कार्रवाई का डर बना रहा तो इसका असर डॉक्टरों के निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ सकता है।
खासकर आपातकालीन चिकित्सा और गंभीर बीमारियों के मामलों में डॉक्टरों को कई बार तत्काल निर्णय लेने पड़ते हैं। ऐसे मामलों में मरीज की हालत पहले से गंभीर होने के कारण इलाज के बावजूद अप्रत्याशित परिणाम सामने आ सकते हैं।
IMA और हॉस्पिटल बोर्ड का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों का चिकित्सकीय मूल्यांकन किए बिना सीधे कार्रवाई करने से डॉक्टरों में असुरक्षा की भावना बढ़ेगी और इसका अप्रत्यक्ष असर मरीजों को मिलने वाली चिकित्सा सेवाओं पर भी पड़ सकता है।
आयुष्मान योजना के भुगतान का मुद्दा भी उठा
बैठक में केवल कार्रवाई का मुद्दा ही नहीं, बल्कि अस्पतालों के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। अस्पताल संचालकों ने आयुष्मान भारत योजना के तहत करीब आठ साल पुरानी दरों पर इलाज किए जाने का मुद्दा उठाया।
अस्पताल प्रबंधन के मुताबिक, पिछले करीब तीन महीने से कई भुगतान लंबित हैं। दूसरी ओर अस्पतालों के संचालन की लागत लगातार बढ़ रही है। कर्मचारियों के वेतन, बिजली बिल, दवाइयों और चिकित्सा उपकरणों के रखरखाव समेत अन्य खर्चों में लगातार वृद्धि हो रही है।
ऐसे में लंबे समय से लागू पुरानी दरों पर मरीजों को सेवाएं देना और अस्पतालों का संचालन करना मुश्किल होता जा रहा है।
अस्पतालों के लिए NOC और अनुमति प्रक्रिया सरल करने की मांग
बैठक में अस्पतालों से जुड़ी शासकीय अनुमतियों और NOC की प्रक्रिया को भी सरल करने की मांग उठाई गई। अस्पताल संचालकों का कहना है कि विभिन्न अनुमति प्रक्रियाओं में लगने वाला समय और प्रशासनिक जटिलताएं अस्पताल संचालन को प्रभावित करती हैं।
IMA की ओर से कहा गया कि अस्पतालों की जांच और कार्रवाई की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें मरीजों के उपचार में किसी तरह की बाधा न आए और चिकित्सक भी बिना अनावश्यक भय के अपनी जिम्मेदारी निभा सकें।
डॉक्टरों का संदेश- जांच का विरोध नहीं, प्रक्रिया निष्पक्ष हो
चिकित्सक संगठनों ने स्पष्ट किया कि वे अस्पतालों की जांच या शिकायतों की सुनवाई के खिलाफ नहीं हैं। उनकी मुख्य मांग निष्पक्ष और विशेषज्ञ आधारित जांच प्रक्रिया को लेकर है।
संगठनों के अनुसार, मरीजों के हितों की रक्षा के साथ-साथ डॉक्टरों और अस्पतालों को भी अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। इससे शिकायतों का सही मूल्यांकन होगा और वास्तविक लापरवाही के मामलों में कार्रवाई के साथ-साथ गलत या अधूरी शिकायतों के कारण होने वाली परेशानी से भी बचा जा सकेगा।
Author: Khabri Chai
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