Bilaspur High Court: DNA रिपोर्ट में पिता न होने पर भी रिकॉर्ड से नहीं हटेगा नाम, हाईकोर्ट ने बताई वजह

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चे की वैधता और कानूनी पितृत्व से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को केवल DNA रिपोर्ट के आधार पर पति की संतान मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसी ठोस परिस्थितियों का प्रमाण जरूरी है, जिससे कानून में मौजूद वैधता की धारणा को खत्म किया जा सके।

Puttur student pregnancy case: DNA test conducted |  Udayavani - Latest English News, Udayavani Newspaper

जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल जैविक संबंध को आधार बनाकर फैसला नहीं किया जा सकता। बच्चे की पहचान, वैधता और गरिमा से जुड़े कानूनी पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

पति ने कहा- बेटी जैविक संतान नहीं, रिकॉर्ड से हटे नाम

मामला दुर्ग जिले के एक व्यक्ति से जुड़ा है। उसने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि नाबालिग लड़की उसकी जैविक बेटी नहीं है। इसलिए सरकारी और शैक्षणिक दस्तावेजों में पिता के रूप में दर्ज उसका नाम हटाया जाना चाहिए।

फैमिली कोर्ट ने उसकी मांग खारिज कर दी। इसके बाद व्यक्ति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

याचिकाकर्ता का विवाह 5 मई 2005 को हुआ था और विवाह के दौरान 21 सितंबर 2006 को बेटी का जन्म हुआ। बाद में पति-पत्नी का 15 नवंबर 2016 को आपसी सहमति से तलाक हो गया।

व्यक्ति का दावा था कि बाद में सामने आई DNA रिपोर्ट से उसे पता चला कि वह बच्ची का जैविक पिता नहीं है। इसी आधार पर वह रिकॉर्ड में दर्ज पिता के रूप में अपना नाम हटवाना चाहता था।

कानून में वैध विवाह से जन्मे बच्चे के पक्ष में मजबूत धारणा

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 का उल्लेख किया। यह प्रावधान पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 से संबंधित कानूनी सिद्धांत को आगे बढ़ाता है।

इस प्रावधान के तहत वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता के पक्ष में एक मजबूत कानूनी धारणा रहती है। यानी यदि बच्चा पति-पत्नी के वैध विवाह के दौरान पैदा हुआ है, तो सामान्य तौर पर पति को उसका कानूनी पिता माना जाता है।

इस धारणा को खत्म करने के लिए केवल DNA रिपोर्ट पर्याप्त नहीं मानी जाएगी। इसके लिए यह साबित करना जरूरी होता है कि बच्चे के गर्भधारण की संभावित अवधि में पति-पत्नी के बीच ऐसा कोई संपर्क या साथ रहना संभव ही नहीं था, जिससे पति बच्चे का जैविक पिता हो सकता।

याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि साथ रहना संभव नहीं था

हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने न तो यह स्पष्ट रूप से कहा था और न ही ऐसा कोई ठोस साक्ष्य पेश किया था कि बच्ची के गर्भधारण की संभावित अवधि में उसका अपनी पत्नी के साथ रहना या संपर्क होना संभव नहीं था।

अदालत ने इसी महत्वपूर्ण पहलू को ध्यान में रखते हुए कहा कि केवल DNA रिपोर्ट के आधार पर वैध विवाह के दौरान जन्मी बच्ची की कानूनी स्थिति को खत्म नहीं किया जा सकता।

DNA रिपोर्ट और कानूनी पितृत्व में अंतर

इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जैविक पिता और कानूनी पिता की अवधारणाएं हर परिस्थिति में एक जैसी नहीं होतीं।

DNA जांच किसी व्यक्ति के जैविक संबंध के बारे में वैज्ञानिक जानकारी दे सकती है, लेकिन वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की कानूनी स्थिति को बदलने के लिए कानून में निर्धारित शर्तों को भी पूरा करना जरूरी है।

यही वजह है कि हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध परिस्थितियों में DNA रिपोर्ट के आधार पर रिकॉर्ड से पिता का नाम हटाना उचित नहीं होगा।

बेटी के सरकारी और शैक्षणिक रिकॉर्ड में बना रहेगा नाम

हाईकोर्ट के फैसले का सीधा असर उस बच्ची के दस्तावेजों पर पड़ेगा। अदालत ने माना कि सिर्फ DNA रिपोर्ट के आधार पर सरकारी और शैक्षणिक रिकॉर्ड में दर्ज पिता का नाम हटाने का आधार नहीं बनता।

इस तरह बच्ची की कानूनी वैधता और उसकी पहचान को संरक्षण मिलेगा, जबकि याचिकाकर्ता द्वारा केवल जैविक पितृत्व के आधार पर रिकॉर्ड बदलने की मांग स्वीकार नहीं की गई।

फैसले का व्यापक महत्व

यह फैसला केवल एक पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि विवाह, पितृत्व और बच्चे की कानूनी पहचान से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में बच्चे के हित और उसकी गरिमा को नजरअंदाज करके केवल जैविक संबंध को निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।

Khabri Chai
Author: Khabri Chai

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