नई दिल्ली। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर देश में राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। इसी बीच 2 हजार से अधिक नागरिकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों को खुला पत्र भेजकर SIR प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और इसकी कानूनी एवं प्रक्रियागत समीक्षा की मांग की है। पत्र में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म, ECINet सिस्टम और कथित तौर पर हटाए गए मतदाताओं की बहाली जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—द्वारा पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। चुनाव आयोग ने हालांकि कहा है कि SIR से संबंधित उसके फैसलों को तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मत मंजूरी मिली है।
2 हजार से ज्यादा लोगों ने CJI को लिखा खुला पत्र
25-28 सितंबर के आसपास सामने आए इस खुले पत्र पर शिक्षाविदों, वकीलों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पूर्व अधिकारियों और अन्य नागरिकों समेत 2 हजार से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर बताए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार हस्ताक्षरकर्ताओं में पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अभिनेता प्रकाश राज समेत कई प्रमुख नाम शामिल हैं।
पत्र में सुप्रीम कोर्ट से SIR के संबंध में स्वतः संज्ञान (suo motu cognisance) लेने की अपील की गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने मांग की है कि SIR की वैधता और प्रक्रिया की स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा पूरी होने तक इस पर रोक लगाने पर विचार किया जाए।
पत्र में ECINet के स्वतंत्र सुरक्षा एवं कानूनी ऑडिट तथा कथित रूप से प्रक्रिया या सॉफ्टवेयर संबंधी कारणों से सूची से बाहर हुए मतदाताओं की बहाली जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं। हालांकि, पत्र में लगाए गए आरोप स्वयं पत्र पर हस्ताक्षरकर्ताओं के दावे हैं और उनकी स्वतंत्र पुष्टि अलग से न्यायिक या आधिकारिक जांच का विषय है।
विवाद की जड़ में चुनाव आयोग के भीतर दर्ज 14 आपत्तियां
SIR विवाद को उस समय और गति मिली जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की।
रिपोर्ट के मुताबिक ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर लिस्ट से नाम हटाने और बहाली, Form-6 में बदलाव, चुनावी डेटा के केंद्रीकरण तथा IT सिस्टम तक अधिकारियों की पहुंच जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने कहा था कि निर्णय या आदेश उनके संज्ञान अथवा जानकारी के बिना जारी किए गए। वहीं चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि आंतरिक विचार-विमर्श में अलग-अलग राय होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम निर्णय आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए।
Form-6 और वोटर डेटाबेस को लेकर क्या है विवाद?
इस पूरे मामले में Form-6 और चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन का मुद्दा प्रमुख है। रिपोर्टों के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म में किए गए बदलाव और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण से संबंधित सवाल शामिल थे।
विशेष रूप से ECINet को लेकर सवाल उठे कि चुनावी डेटा और IT सिस्टम पर नियंत्रण किस स्तर पर होना चाहिए और फील्ड अधिकारियों की भूमिका किस तरह सुनिश्चित की जाए। आयोग ने अब ECINet की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने की घोषणा की है, जिसमें वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त के साथ स्वतंत्र IIT/IIIT विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा।
26 सितंबर की बैठक में EC ने लिए 9 बड़े फैसले
विवाद के बीच 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी की मौजूदगी में पूर्ण आयोग की बैठक हुई। इसके बाद चुनाव आयोग ने 9 फैसलों की घोषणा की। इनमें SIR नोटिस पाने वाले मतदाताओं की प्रक्रिया को आसान बनाने और IT सिस्टम की समीक्षा से लेकर आयोग की बैठकों में पारदर्शिता बढ़ाने तक के फैसले शामिल हैं।
1. घर जाकर दस्तावेज जुटाए जाएंगे
जिन लोगों को SIR के दौरान unmapped records या logical discrepancies के आधार पर नोटिस जारी हुए हैं, उनके घर जाकर BLO दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें ECINet पर अपलोड करेंगे।
2. हर मामले में व्यक्तिगत सुनवाई जरूरी नहीं
ऐसे मतदाताओं को सामान्य तौर पर ERO/AERO कार्यालय में व्यक्तिगत सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी। केवल विशेष परिस्थितियों में सुनवाई की जा सकेगी और आयोग ने इसे संभव होने पर ऑनलाइन रखने की बात कही है।
3. छूटे पात्र मतदाताओं की पहचान
आयोग ने ऐसे पात्र लोगों की पहचान और नामांकन के लिए प्रयास करने की बात कही है, जो किसी कारण से मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं।
4. ECINet की तकनीकी समीक्षा
ECINet के कामकाज और संबंधित कानूनी एवं प्रक्रियागत अनुपालन की समीक्षा के लिए समिति गठित की जाएगी। इसमें स्वतंत्र IIT/IIIT विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा।
5. दिल्ली में दावा-आपत्ति की समयसीमा बढ़ी
दिल्ली में SIR से संबंधित दावे और आपत्तियां दर्ज करने की समयसीमा बढ़ाई गई है।
6. महाराष्ट्र में भी समयसीमा बढ़ाई गई
महाराष्ट्र में भी मतदाताओं को दावे और आपत्तियां दर्ज करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया है।
7. आयोग की बैठकों का एजेंडा पहले साझा होगा
अब आयोग की बैठकों से पहले एजेंडा साझा करने का निर्णय लिया गया है, ताकि तीनों आयुक्तों को प्रस्तावित विषयों की जानकारी पहले से हो।
8. बैठक की कार्यवाही का रिकॉर्ड तैयार होगा
बैठकों के बाद मिनट्स यानी कार्यवाही का रिकॉर्ड तैयार करने की व्यवस्था को भी स्पष्ट किया गया है।
9. नए IT मॉड्यूल की समीक्षा
नए IT मॉड्यूल और पोर्टल को लागू करने से पहले उनकी समीक्षा और जरूरी जांच की प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया गया है। आयोग ने IT से जुड़े निर्णयों में संस्थागत निगरानी को मजबूत करने की बात कही है।
Form-6 पर आयोग ने क्या कहा?
SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR के लिए इस्तेमाल किए जा रहे Form-6 से संबंधित घोषणा को सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले के संदर्भ में लागू किया गया है। आयोग के अनुसार, SIR के बाहर सामान्य अवधि में Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म का इस्तेमाल जारी रहेगा।
यानी Form-6 को लेकर उठी आपत्तियों के बीच आयोग ने अपनी प्रक्रिया और कानूनी आधार को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने की कोशिश की है।
आयोग ने आंतरिक मतभेद की खबरों पर क्या कहा?
चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR का मूल आदेश और उससे जुड़े कार्यक्रम तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मत मंजूरी से जारी किए गए थे। आयोग ने यह भी कहा कि आंतरिक चर्चाओं में अलग-अलग राय होना सामान्य है, लेकिन अंतिम निर्णय संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
दूसरी ओर, मीडिया रिपोर्टों में दर्ज 14 औपचारिक आपत्तियों ने आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, IT सिस्टम के नियंत्रण और मतदाता डेटा के प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इन दावों और आयोग के स्पष्टीकरण के बीच अब विवाद का कानूनी और संस्थागत पक्ष महत्वपूर्ण हो गया है।
अब सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर नजर
2 हजार से अधिक नागरिकों के खुले पत्र के बाद SIR को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग फिर चर्चा में है। हालांकि, इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR की संवैधानिक वैधता से जुड़े मामले में चुनाव आयोग की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं।
अब ताजा खुले पत्र में उठाए गए मुद्दों, चुनाव आयोग की हालिया घोषणाओं और SIR से संबंधित लंबित कानूनी मामलों के बीच आगे की न्यायिक कार्यवाही पर नजर रहेगी। फिलहाल चुनाव आयोग ने अपने 26 सितंबर के फैसलों के जरिए प्रक्रिया, IT सिस्टम और आंतरिक कामकाज से जुड़े कई बिंदुओं पर अपना पक्ष स्पष्ट किया है।
Author: Khabri Chai
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