बस्तर दशहरा में पूरी हुई ‘मगरमुही’ रस्म, मांगुर मछली और बकरे की बलि के बाद तेज हुआ विशाल विजय रथ का निर्माण

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में आस्था, परंपरा और आदिवासी संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। इसी कड़ी में 16 अक्टूबर 2026 को बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्म ‘मगरमुही’ विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। इस अनुष्ठान के साथ ही आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ के निर्माण कार्य ने भी रफ्तार पकड़ ली है। परंपरा के अनुसार, रस्म के दौरान खाती पुजारी ने पूजा-अर्चना की और मांगुर मछली तथा बकरे की बलि दी गई।

बस्तर दशहरा की यह रस्म केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही स्थानीय परंपराओं, कारीगरों के कौशल और बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को भी दर्शाती है।

क्या है मगरमुही रस्म का महत्व?

बस्तर दशहरा में विजय रथ का निर्माण कई पारंपरिक प्रक्रियाओं के तहत किया जाता है। मगरमुही रस्म को इसी निर्माण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस अनुष्ठान से रथ निर्माण में आने वाली बाधाओं से रक्षा और कार्य के निर्विघ्न संपन्न होने की कामना की जाती है।

रस्म के दौरान पारंपरिक पूजा-पाठ किया जाता है। मांगुर मछली और बकरे की बलि भी इस अनुष्ठान का हिस्सा है। यह परंपरा बस्तर दशहरा के विशिष्ट धार्मिक स्वरूप को सामने लाती है।

आठ पहियों वाले विशाल रथ का निर्माण तेज

मगरमुही रस्म पूरी होने के बाद विजय रथ के निर्माण का काम महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया है। इस विशाल रथ में आठ पहिए लगाए जाते हैं। इन्हें आपस में जोड़ने और पूरे ढांचे को मजबूती देने के लिए लकड़ी के बड़े-बड़े हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है।

रथ का निर्माण अत्यंत सावधानी और पारंपरिक तकनीक से किया जाता है। इसकी विशाल संरचना को तैयार करने में स्थानीय कारीगरों का अनुभव और शारीरिक मेहनत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बिना आधुनिक मशीनों के तैयार होता है रथ

बस्तर दशहरा की एक बड़ी विशेषता यह है कि विशाल विजय रथ का निर्माण आज भी पारंपरिक औजारों और पीढ़ियों से चले आ रहे कारीगरी के ज्ञान के आधार पर किया जाता है। आधुनिक मशीनों पर निर्भरता के बजाय स्थानीय कारीगर अपने अनुभव और पारंपरिक तकनीकों से रथ के विभिन्न हिस्सों को तैयार करते हैं।

लकड़ी के भारी हिस्सों को आकार देना, उन्हें जोड़ना और पूरे ढांचे को संतुलित रखना विशेष कौशल की मांग करता है। यह प्रक्रिया बस्तर की पारंपरिक तकनीक और सामुदायिक सहभागिता का उदाहरण है।

भीतर रैनी और बाहरा रैनी में होता है रथ का उपयोग

बस्तर दशहरा में विजय रथ का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। आठ पहियों वाला यह रथ आगे चलकर दशहरा के प्रमुख आयोजनों भीतर रैनी और बाहरा रैनी में इस्तेमाल किया जाता है।

इन आयोजनों के दौरान रथ से जुड़ी परंपराएं बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करती हैं। यही वजह है कि रथ निर्माण की प्रत्येक प्रक्रिया को परंपरागत विधि और मान्यताओं के अनुरूप पूरा किया जाता है।

बस्तर की पहचान है सदियों पुरानी परंपरा

बस्तर दशहरा देश के अन्य स्थानों पर मनाए जाने वाले दशहरा उत्सवों से अपने स्वरूप में अलग है। यहां उत्सव की पहचान स्थानीय देवी-देवताओं, आदिवासी परंपराओं और लंबे समय से चले आ रहे धार्मिक आयोजनों से जुड़ी है।

मगरमुही रस्म का संपन्न होना और विजय रथ के निर्माण में तेजी आना इस ऐतिहासिक उत्सव की तैयारियों के आगे बढ़ने का संकेत है। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था को अभिव्यक्त करता है, बल्कि बस्तर के पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय कारीगरों की दक्षता और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।

Khabri Chai
Author: Khabri Chai

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