जशपुर में सोलर टनल ड्रायर से बदलेगी महुआ की किस्मत: DST परियोजना से खाद्य-ग्रेड प्रसंस्करण को मिली नई दिशा!

रायपुर, 29 जनवरी 2026। छत्तीसगढ़ में स्थानीय संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग और आदिवासी आजीविका सुदृढ़ करने की दिशा में जशपुर जिला एक नई मिसाल बनकर उभर रहा है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) प्रायोजित परियोजना के तहत जशपुर में सोलर टनल ड्रायर की स्थापना की गई है, जिससे महुआ और वनौषधियों के वैज्ञानिक एवं स्वच्छ प्रसंस्करण का मार्ग खुला है। यह पहल महुआ के मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाएगी।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य में नवाचार और पारंपरिक संसाधनों के आधुनिक उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जशपुर पहले ही महुआ आधारित उत्पादों—जैसे महुआ नेक्टर, च्यवनप्राश, लड्डू और कुकीज़—के लिए पहचान बना चुका है। हालांकि, खाद्य-ग्रेड महुआ के संग्रहण और सुरक्षित सुखाने की प्रक्रिया एक बड़ी चुनौती थी, जिससे गुणवत्ता और बाज़ार क्षमता प्रभावित होती थी।

इसी समस्या के समाधान के लिए DST द्वारा स्वीकृत परियोजना “Technological Augmentation of Indigenous Practices of ST Communities of Chhattisgarh for Sustainable Livelihood and Entrepreneurial Development” को जशपुर में लागू किया गया है। इस परियोजना को वैज्ञानिक डॉ. प्रसन्ना कुमार जीवी के नेतृत्व में स्थानीय सहभागिता के साथ क्रियान्वित किया जा रहा है। राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन संस्थान (NIFTEM), कुंडली के सहयोग से स्थापित सोलर टनल ड्रायर इस परियोजना का प्रमुख घटक है। इसमें जय जंगल फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई है।

फूड प्रोसेसिंग कंसल्टेंट एवं युवा वैज्ञानिक समर्थ जैन के अनुसार पारंपरिक खुले में महुआ सुखाने से धूल, नमी और कीटों का खतरा बना रहता है, जिससे गुणवत्ता गिरती है। सोलर टनल ड्रायर नियंत्रित तापमान में स्वच्छ और समान रूप से सुखाने की सुविधा देता है, जिससे महुआ का रंग, सुगंध और पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। साथ ही दीर्घकालीन भंडारण संभव हो पाता है। यह पूरी तरह सौर ऊर्जा आधारित प्रणाली है, जो पर्यावरण के अनुकूल भी है।

परियोजना के तहत वनौषधियों के प्रसंस्करण पर भी जोर दिया गया है। आदिवासी महिला लाभार्थियों को गिलोय, अडूसा जैसी औषधीय वनस्पतियों और पालक जैसी सब्ज़ियों के वैज्ञानिक निर्जलीकरण का प्रशिक्षण और लाइव डेमो दिया गया। सुरक्षित हैंडलिंग, नमी नियंत्रण और वैज्ञानिक भंडारण तकनीकों की जानकारी ने उन्हें व्यावहारिक कौशल प्रदान किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी प्रणालियाँ राज्य के अन्य वनोपज क्षेत्रों में भी स्थापित की जाएँ, तो अपव्यय कम होगा, खाद्य-ग्रेड उत्पादों की उपलब्धता बढ़ेगी और आदिवासी समुदायों की आय में स्थायी वृद्धि होगी। जशपुर की यह पहल छत्तीसगढ़ में वन आधारित अर्थव्यवस्था और नवाचार को नई दिशा देने वाली साबित हो रही है।

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Author: Khabri Chai

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