कोलकाता, 8 सितंबर 2026। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा शुरू होने से पहले ही खान-पान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन से परहेज की अपील और बंगाल के हिंदुओं से नॉनवेज छोड़ने की अपील के बाद अब भाजपा के भीतर से ही अलग रुख सामने आया है। बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि बंगाली क्या खाएगा, यह कोई बाहर से आकर तय नहीं कर सकता।
यह विवाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) की ओर से दुर्गा पूजा के दौरान पूजा पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन से बचने की अपील और बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री की ओर से बंगाल के हिंदुओं से नॉनवेज छोड़ने की अपील के बाद शुरू हुआ है।

बंगाल की थाली पर सियासत क्यों?
पश्चिम बंगाल की खान-पान संस्कृति में मछली का विशेष स्थान माना जाता है। बंगाली समाज के बड़े हिस्से में मछली लंबे समय से भोजन और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा रही है। ऐसे में पूरे समुदाय के खान-पान को लेकर कोई अपील या सुझाव सामने आने पर इसका राजनीतिक असर भी दिखाई देने लगा है।
समिक भट्टाचार्य के बयान को इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने धार्मिक आस्था के सम्मान के साथ-साथ लोगों की व्यक्तिगत पसंद और खान-पान की स्वतंत्रता पर जोर दिया है।
VHP और धीरेंद्र शास्त्री की अपील के बाद विवाद
दुर्गा पूजा के दौरान पूजा स्थलों के आसपास मांसाहारी भोजन से दूरी बनाए रखने की अपील के बाद बहस शुरू हुई। इसके बाद धीरेंद्र शास्त्री की ओर से भी बंगाल के हिंदुओं से नॉनवेज छोड़ने की अपील सामने आई।
इस पर सवाल उठने लगा कि क्या धार्मिक आयोजन की मर्यादा को लेकर की गई अपील को पूरे समाज की खान-पान की आदतों तक बढ़ाया जा सकता है?
हालांकि पूजा पंडालों और धार्मिक स्थलों के अपने स्थानीय नियम या व्यवस्थाएं हो सकती हैं, लेकिन पूरे समाज के निजी भोजन पर एक समान मानक लागू करने का मुद्दा अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
समिक भट्टाचार्य ने क्या कहा?
बंगाल भाजपा अध्यक्ष का रुख इस मामले में इसलिए अहम है क्योंकि उन्होंने सीधे तौर पर बंगाल की स्थानीय संस्कृति और लोगों की भोजन संबंधी पसंद का पक्ष रखा है।
उनका कहना है कि बंगाली समाज की अपनी खान-पान परंपरा है और लोगों को अपनी पसंद का भोजन करने का अधिकार है। इस बयान को धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन की भाजपा के भीतर से आई आवाज के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या सिर्फ मछली और मांस का मुद्दा है?
यह विवाद केवल मछली या मांस खाने तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में बड़ा सवाल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का है।
भारत में एक ही धर्म या समुदाय के लोगों की खान-पान की आदतें भी अलग-अलग होती हैं। कुछ लोग शाकाहारी भोजन पसंद करते हैं, जबकि कई लोग मछली, मांस या अंडे का सेवन करते हैं। वहीं धार्मिक, स्वास्थ्य, पारिवारिक या व्यक्तिगत कारणों से कुछ लोग विशेष खाद्य पदार्थों से परहेज भी करते हैं।
ऐसे में किसी एक खान-पान को पूरे समाज के लिए आदर्श मानने की कोशिश स्वाभाविक रूप से बहस और असहमति को जन्म दे सकती है।
NFHS-5 के आंकड़ों में क्या सामने आया?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी NFHS-5 के आंकड़ों के मुताबिक 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग में 70.6 प्रतिशत महिलाएं और 83.4 प्रतिशत पुरुष मछली, चिकन या मांस जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं।
हालांकि इन आंकड़ों को रोजाना नॉनवेज खाने वालों का आंकड़ा नहीं माना जा सकता। फिर भी इससे यह संकेत मिलता है कि भारत में मांसाहारी भोजन समाज के एक बड़े हिस्से की खान-पान की आदतों का हिस्सा है।
पोषण का पहलू भी महत्वपूर्ण
खान-पान की बहस को केवल धार्मिक या राजनीतिक नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। भारत में कुपोषण और एनीमिया जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। ऐसे में लोगों के भोजन को लेकर चर्चा में पोषण का पहलू भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
मछली, अंडा और मांस कई लोगों के लिए प्रोटीन तथा अन्य पोषक तत्वों के स्रोत हैं, जबकि संतुलित शाकाहारी भोजन भी पर्याप्त पोषण दे सकता है। इसलिए भोजन को लेकर बहस का केंद्र लोगों पर किसी एक विकल्प को थोपने के बजाय संतुलित और पौष्टिक आहार होना चाहिए।
बंगाल की राजनीति में पहले भी उठा है मछली का मुद्दा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में खान-पान का मुद्दा नया नहीं है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी मछली खाने और खिलाने को लेकर राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिली थी। उस समय बंगाली संस्कृति और मछली को लेकर काफी राजनीतिक चर्चा हुई थी।
अब दुर्गा पूजा से पहले नॉनवेज छोड़ने की अपील सामने आने के बाद पुराने राजनीतिक बयानों की भी चर्चा शुरू हो गई है।
दुर्गा पूजा और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान से भी गहराई से जुड़ा उत्सव है। पूजा के दौरान परिवार और समुदाय के लोग एक साथ उत्सव मनाते हैं।
यही वजह है कि पूजा की धार्मिक मर्यादा और लोगों की निजी जिंदगी के बीच संतुलन का सवाल भी इस विवाद में महत्वपूर्ण हो गया है।
धार्मिक स्थल की मर्यादा बनाए रखना एक अलग विषय है, जबकि किसी व्यक्ति की निजी रसोई या भोजन की पसंद को तय करना अलग विषय माना जा सकता है।
आखिर बंगाली क्या खाएगा?
पूरे विवाद के बीच समिक भट्टाचार्य का बयान इस सवाल को सीधे सामने लाता है कि किसी क्षेत्र की खान-पान संस्कृति और व्यक्तिगत पसंद का फैसला कौन करेगा।
एक तरफ धार्मिक आस्था और पूजा की मर्यादा है, तो दूसरी तरफ व्यक्ति की निजी पसंद और स्वतंत्रता। ऐसे में बहस केवल शाकाहार बनाम मांसाहार की न होकर इस बात पर केंद्रित हो गई है कि लोकतांत्रिक समाज में किसी व्यक्ति के निजी खान-पान के फैसले की सीमा क्या होनी चाहिए।
फिलहाल दुर्गा पूजा से पहले बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा गरमा गया है। देखना होगा कि आने वाले दिनों में यह बहस धार्मिक आयोजन की मर्यादा तक सीमित रहती है या फिर विधानसभा चुनावों की तरह एक बार फिर बंगाल की सियासत में मछली-मांस और खान-पान बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाता है।
Author: Khabri Chai
Khabri Chai news portal.





