बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के समान पेंशन देने की मांग को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंचायत कर्मचारियों की ओर से दायर 21 से अधिक याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनपद पंचायत के कर्मचारी राज्य सरकार के शासकीय सेवक या राज्य सिविल सेवा के कर्मचारी नहीं हैं। ऐसे में केवल लंबे समय तक पंचायत सेवा में काम करने के आधार पर उन्हें राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के समान पेंशन देने का कोई वैधानिक आधार नहीं है।
यह फैसला जस्टिस बिशु दत्ता गुरु की पीठ ने संबंधित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया।

क्या था पूरा मामला?
दरअसल, अलग-अलग जनपद पंचायतों से सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर सरकारी कर्मचारियों के समान पेंशन की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उन्होंने पंचायतों में लंबे समय तक समान पदों और जिम्मेदारियों के साथ सेवाएं दी हैं। इसके बावजूद सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन का लाभ नहीं देना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पुराने सेवा प्रावधानों, पेंशन से जुड़े अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी हवाला दिया गया।
कुछ कर्मचारियों को पेंशन मिलने का भी दिया गया हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह महत्वपूर्ण तर्क रखा गया कि कुछ जनपद पंचायतों में समान पदों पर काम कर चुके कर्मचारियों को पहले से पेंशन का लाभ दिया जा रहा है।
विशेष रूप से जनपद पंचायत गुंडरदेही (बालोद) और तखतपुर (बिलासपुर) के कुछ कर्मचारियों का उदाहरण दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जब समान परिस्थितियों में कुछ कर्मचारियों को पेंशन दी जा रही है तो अन्य कर्मचारियों को इससे वंचित करना समानता के अधिकार के विपरीत है।
इसी आधार पर पेंशन का लाभ सभी पात्र पंचायत कर्मचारियों को देने की मांग की गई थी।
धारा 131 समेत पुराने प्रावधानों का हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 131 सहित पुराने सेवा प्रावधानों और पेंशन संबंधी अधिकारों का उल्लेख किया गया। उनका कहना था कि पंचायत सेवा में लंबे समय तक कार्य करने वाले कर्मचारियों की पुरानी सेवा शर्तों और उनसे जुड़े लाभों को संरक्षण मिलना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का भी हवाला दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों के आधार पर राज्य कर्मचारियों के समान पेंशन का अधिकार स्वीकार नहीं किया।
राज्य सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?
राज्य शासन की ओर से अदालत में स्पष्ट किया गया कि संबंधित कर्मचारी जनपद पंचायत के कर्मचारी थे, राज्य सिविल सेवा के कर्मचारी नहीं।
शासन के मुताबिक पंचायत कर्मचारियों की सेवा शर्तें राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों से अलग हैं। इसलिए राज्य सरकार के कर्मचारियों पर लागू पेंशन संबंधी नियमों को पंचायत कर्मचारियों पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि वर्ष 1976 के संबंधित सेवा नियमों में सेवानिवृत्ति लाभ के रूप में भविष्य निधि की व्यवस्था थी। बाद में पंचायत सेवा से जुड़े 1999 के नियमों में राज्य कर्मचारियों की तरह पेंशन देने का कोई प्रावधान नहीं किया गया।
CPF का लाभ ले चुके कर्मचारियों का भी मामला
सुनवाई के दौरान शासन की ओर से यह भी बताया गया कि कुछ याचिकाकर्ता पहले ही अंशदायी भविष्य निधि (CPF) का लाभ प्राप्त कर चुके हैं।
सरकार का तर्क था कि जब संबंधित कर्मचारियों को लागू व्यवस्था के तहत CPF का लाभ मिल चुका है, तो अब उन्हें राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के समान पेंशन देने का अलग से कोई वैधानिक आधार नहीं है।
स्थानीय निधि से कुछ कर्मचारियों को मिल रही थी पेंशन
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। बताया गया कि गुंडरदेही के तीन और तखतपुर के तीन कर्मचारियों को संबंधित जनपद पंचायतों द्वारा स्थानीय निधि बनाकर पेंशन दी जा रही है।
हालांकि, शासन ने स्पष्ट किया कि पंचायत स्तर पर स्थानीय निधि से किया गया ऐसा भुगतान राज्य सरकार की नियमित पेंशन व्यवस्था के बराबर नहीं माना जा सकता।
अर्थात कुछ कर्मचारियों को स्थानीय स्तर पर पेंशन मिलने मात्र से अन्य पंचायत कर्मचारियों के लिए राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान पेंशन का वैधानिक अधिकार पैदा नहीं होता।
पंचायतों को जारी हो चुके हैं नोटिस
स्थानीय निधि से पेंशन दिए जाने के इसी मामले को लेकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की ओर से संबंधित पंचायतों को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
अब इस मामले में विभागीय स्तर पर आगे क्या कार्रवाई होती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
21 से अधिक याचिकाएं खारिज
हाईकोर्ट के फैसले का सीधा असर उन सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों पर पड़ेगा, जो राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों की तरह पेंशन की मांग कर रहे थे।
अदालत ने 21 से अधिक याचिकाओं को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि पंचायत सेवा और राज्य सिविल सेवा अलग-अलग श्रेणियां हैं। इसलिए पंचायत कर्मचारी होने के आधार पर राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के समान पेंशन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
फैसले से क्या साफ हुआ?
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल यह स्थिति स्पष्ट हो गई है कि:
- जनपद पंचायत के कर्मचारी राज्य सिविल सेवा के कर्मचारी नहीं माने जाएंगे।
- राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के लिए लागू पेंशन नियम पंचायत कर्मचारियों पर स्वतः लागू नहीं होते।
- पुराने सेवा नियमों में उपलब्ध सेवानिवृत्ति लाभ और CPF व्यवस्था को भी अदालत ने ध्यान में रखा।
- कुछ पंचायतों द्वारा स्थानीय निधि से पेंशन दिए जाने को राज्य सरकार की नियमित पेंशन व्यवस्था नहीं माना जा सकता।
- 21 से अधिक याचिकाओं के खारिज होने से समान पेंशन की मांग कर रहे सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा है।
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Author: Khabri Chai
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