रायपुर की ऐतिहासिक जेल: अंग्रेजों के जमाने की इस जेल में कैद थे क्रांतिकारी, वीर नारायण सिंह की शहादत से जुड़ा है इतिहास

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर आज आधुनिक शहर के रूप में तेजी से विकसित हो रही है, लेकिन शहर के बीचों-बीच इतिहास का एक ऐसा अध्याय भी मौजूद है, जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और छत्तीसगढ़ के वीर क्रांतिकारियों की शहादत की याद दिलाता है। मेकाहारा चौक के पास मौजूद वर्तमान केंद्रीय जेल से अलग रायपुर में अंग्रेजों के दौर की एक पुरानी जेल भी हुआ करती थी। बताया जाता है कि इसी जेल में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने वाले क्रांतिकारियों को कैद रखा जाता था।

इस ऐतिहासिक जेल का निर्माण अंग्रेजी शासनकाल में हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार, 1857 की क्रांति के दौरान रायपुर और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर इस जेल में रखा गया था। आज इस पुराने जेल परिसर के कई हिस्से भले ही अस्तित्व में नहीं हैं, लेकिन बचे हुए अवशेष उस दौर की कहानी बयां करते हैं।

वीर नारायण सिंह की शहादत से जुड़ी है यह जगह

इस पुरानी जेल की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी वीर नारायण सिंह से जुड़ी बताई जाती है। वे छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में गिने जाते हैं और 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करने के कारण गिरफ्तार किए गए थे।

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में वीर नारायण सिंह को फांसी दी गई थी। बताया जाता है कि यह फांसी इसी पुरानी जेल के आसपास के क्षेत्र में दी गई थी। उनकी शहादत छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।

1857 की क्रांति में 18 क्रांतिकारियों की शहादत का दावा

इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार, 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने विद्रोह और विरोध को दबाने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया था। रायपुर की इस पुरानी जेल में भी क्रांतिकारियों को बंद रखा जाता था।

इतिहासकार के अनुसार, वीर नारायण सिंह की शहादत के बाद भी रायपुर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध जारी रहा। 22 जनवरी को 17 अन्य क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर फांसी दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह 1857 के आंदोलन में छत्तीसगढ़ से कुल 18 क्रांतिकारियों की शहादत की बात कही जाती है।

उस समय रायपुर में नहीं थी आज की सेंट्रल जेल

इस ऐतिहासिक तथ्य का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 1857 की क्रांति के समय रायपुर की वर्तमान केंद्रीय जेल अस्तित्व में नहीं थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वर्तमान केंद्रीय जेल का निर्माण लगभग 1862 के आसपास हुआ था।

इससे पहले अंग्रेजी शासनकाल में शहर के दूसरे हिस्से में जेल व्यवस्था मौजूद थी। बताया जाता है कि पुरानी जेल का क्षेत्र आज के जयस्तंभ चौक, कोतवाली चौक और बैजनाथपारा के आसपास के इलाके से जुड़ा था।

खाई और कुएं से होती थी जेल की सुरक्षा

इतिहासकारों के मुताबिक, उस समय पुरानी जेल का क्षेत्र प्राकृतिक रूप से भी सुरक्षित था। आसपास पानी का क्षेत्र और एक बड़ी खाई होने की बात सामने आती है। जेल परिसर में एक बड़ा कुआं भी मौजूद था, जिसे बाद में पाट दिया गया।

समय के साथ रायपुर शहर का विस्तार हुआ और पुराने तालाब, परिसर तथा जेल के बड़े हिस्से का स्वरूप बदल गया। हालांकि, कुछ अवशेष आज भी इस ऐतिहासिक स्थान के अस्तित्व की ओर इशारा करते हैं।

संरक्षण के इंतजार में ऐतिहासिक धरोहर

इतिहास से जुड़े लोगों का कहना है कि रायपुर की यह पुरानी जेल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण स्मृति है। इसके बावजूद समय के साथ यह क्षेत्र उपेक्षा का शिकार होता गया और ऐतिहासिक अवशेष खंडहर में बदलते जा रहे हैं।

इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र ने इस स्थान को राष्ट्रीय धरोहर या ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित किए जाने की मांग उठाई है। उनका मानना है कि इस स्थान को विकसित कर नई पीढ़ी को 1857 की क्रांति और छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष से परिचित कराया जा सकता है।

इतिहास को बचाने की जरूरत

रायपुर की यह पुरानी जेल छत्तीसगढ़ के उस दौर की गवाह है, जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाना बेहद कठिन था। वीर नारायण सिंह समेत क्रांतिकारियों की शहादत से जुड़ी इस जगह के बचे हुए अवशेष इतिहास की अनमोल धरोहर हैं। अब जरूरत इस बात की है कि इन अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ऐतिहासिक स्थल को सुरक्षित रखा जाए।

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Author: Khabri Chai

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