बालोद। जिले के रानीमाई मंदिर और आसपास के गांवों में पिछले करीब 59 दिनों से घूम रहे घायल भालू को आखिरकार वन विभाग की टीम ने सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया। भालू के पिछले दाहिने पैर में गंभीर चोट थी, जिसके कारण वह लंबे समय से तीन पैरों के सहारे चल रहा था। दर्द और चोट के बावजूद वह हर शाम भोजन की तलाश में जंगल से निकलकर मंदिर और आबादी वाले इलाकों तक पहुंच जाता था।

भालू के लगातार रिहायशी क्षेत्रों में पहुंचने से ग्रामीणों और मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं में डर बना हुआ था। वन विभाग की टीम कई दिनों से उसकी गतिविधियों पर नजर रख रही थी। आखिरकार उसके आने-जाने के पैटर्न का पता लगाकर मंदिर के पास पिंजरा लगाया गया और गुड़-नारियल की मदद से उसे सुरक्षित पकड़ लिया गया।
16 जुलाई को पहली बार सामने आया था घायल भालू
जानकारी के मुताबिक, घायल भालू की मौजूदगी पहली बार 16 जुलाई 2026 को सामने आई थी। उस दौरान भालू के सड़क पार करने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। वीडियो में उसके पिछले पैर में चोट दिखाई दे रही थी और वह लंगड़ाते हुए सड़क पार करता नजर आया था।
वीडियो सामने आने के बाद वन विभाग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए भालू की गतिविधियों पर निगरानी शुरू की। घायल होने के बावजूद भालू जंगल से निकलकर रानीमाई मंदिर और आसपास के गांवों तक पहुंच रहा था।
शाम होते ही मंदिर और गांवों की ओर निकलता था
वन विभाग की निगरानी में भालू के आने-जाने का एक पैटर्न सामने आया। शाम होते ही वह भोजन की तलाश में जंगल से निकलकर रानीमाई मंदिर की ओर पहुंचता था। इसके बाद आसपास के गांवों और आबादी वाले इलाकों में घूमकर खाने की तलाश करता था।
स्थानीय लोगों के अनुसार, भालू कई बार आसपास के होटलों तक भी पहुंच जाता था और वहां रखा बचा हुआ खाना खा लेता था। भजिया उसे खास तौर पर पसंद था, जिसके लिए वह होटल में भी पहुंच जाता था।
बताया गया कि एक बार उसने होटल में रखी कड़ाही का तेल तक पी लिया था। मंदिर परिसर में जलाए जाने वाले दीयों में मौजूद तेल भी वह पी जाता था। भोजन और तेल की तलाश में बार-बार आबादी वाले क्षेत्र में पहुंचने के कारण लोगों में दहशत बनी हुई थी।
पैरों के निशान से तलाश में जुटी वन विभाग की टीम
घायल भालू को पकड़ना वन विभाग के लिए आसान नहीं था। चोट के बावजूद वह लगातार अपना स्थान बदलता रहता था। ऐसे में वन अमले ने उसके पैरों के निशान और आने-जाने के रास्तों की निगरानी शुरू की।
टीम ने यह पता लगाने की कोशिश की कि भालू किस समय और किस रास्ते से मंदिर की ओर पहुंचता है। लगातार निगरानी के बाद उसके आने का समय और संभावित रास्ता चिन्हित किया गया।
इसके बाद वन विभाग ने उसी इलाके में पिंजरा लगाकर उसे पकड़ने की योजना बनाई।
गुड़ और नारियल की खुशबू से पिंजरे में पहुंचा भालू
भालू को सुरक्षित रेस्क्यू करने के लिए मंदिर के पास पिंजरा लगाया गया। इसके अंदर गुड़ और नारियल रखा गया था। रात में भोजन की तलाश में भालू वहां पहुंचा और गुड़-नारियल की खुशबू से आकर्षित होकर पिंजरे के अंदर चला गया।
जैसे ही भालू पिंजरे के अंदर पहुंचा, उसे सुरक्षित तरीके से बंद कर दिया गया। वन विभाग की टीम ने सावधानीपूर्वक उसका रेस्क्यू किया। घायल होने के कारण भालू के असहज या आक्रामक होने की आशंका को देखते हुए पूरी कार्रवाई सतर्कता के साथ की गई।
इलाज के लिए जंगल सफारी भेजा गया
रेस्क्यू के बाद घायल भालू को सुरक्षित पिंजरे में रखा गया और रायपुर स्थित जंगल सफारी भेजा गया। वहां वन्यजीव विशेषज्ञ उसकी स्वास्थ्य जांच करेंगे और पिछले दाहिने पैर में लगी चोट का उपचार किया जाएगा।
फिलहाल वन विभाग की प्राथमिकता भालू की चोट का इलाज और उसकी सेहत में सुधार करना है। उपचार के दौरान उसकी स्थिति पर लगातार नजर रखी जाएगी।
यदि इलाज के बाद भालू पूरी तरह स्वस्थ पाया जाता है और जंगल में स्वतंत्र रूप से रहने के योग्य होता है, तो उसे उसके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
रेस्क्यू के बाद ग्रामीणों ने ली राहत की सांस
करीब 59 दिनों तक रानीमाई मंदिर और आसपास के गांवों में घूम रहे घायल भालू के सुरक्षित रेस्क्यू के बाद स्थानीय लोगों और मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं ने राहत की सांस ली है।
भालू के घायल होने के बावजूद उसका लगातार आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचना लोगों के लिए चिंता का विषय बना हुआ था। वन विभाग की निगरानी और रणनीति के बाद आखिरकार उसे सुरक्षित पकड़कर उपचार के लिए भेज दिया गया है।
Author: Khabri Chai
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