Commonwealth Games: पोलियो, गरीबी और संघर्ष को हराकर झंडू कुमार ने भारत को दिलाया पहला पदक

ग्लासगो। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पदकों का खाता खुल गया है। भारत के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश को पहला पदक दिलाया। बिहार के रहने वाले 28 वर्षीय झंडू कुमार ने 130.9 पॉइंट्स हासिल कर तीसरा स्थान प्राप्त किया और अपने संघर्ष व मेहनत से करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया।

23 जुलाई से ग्लासगो में शुरू हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के पहले दिन उद्घाटन समारोह के बाद शुक्रवार को विभिन्न पदक स्पर्धाओं की शुरुआत हुई। भारतीय खिलाड़ियों ने कई पैरा स्पर्धाओं में चुनौती पेश की। शुरुआती मुकाबलों में भारत को सफलता नहीं मिली, लेकिन दिन के आखिरी पावरलिफ्टिंग इवेंट में झंडू कुमार ने दमदार प्रदर्शन कर भारत को पहला पदक दिलाया।

शानदार प्रदर्शन, गोल्ड से मामूली अंतर

राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी झंडू कुमार को इस स्पर्धा में भारत की बड़ी उम्मीद माना जा रहा था। ग्रुप-बी में खेलते हुए उन्होंने पहले प्रयास में 181 किलोग्राम वजन उठाया, जिससे उन्हें 124.7 पॉइंट्स मिले।

दूसरे प्रयास में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया और उनका स्कोर 130.9 पॉइंट्स पहुंच गया। तीसरे प्रयास में उन्होंने 196 किलोग्राम उठाने की कोशिश की, लेकिन इसमें सफल नहीं हो सके। इसके बावजूद वह लंबे समय तक शीर्ष स्थान पर बने रहे।

बाद में ग्रुप-ए के खिलाड़ियों ने मुकाबला किया। नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने 208 किलोग्राम वजन उठाकर 132.8 पॉइंट्स के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग ने 199 किलोग्राम वजन उठाकर 131 पॉइंट्स हासिल किए और रजत पदक अपने नाम किया।

अगर झंडू कुमार अपने अंतिम प्रयास में 196 किलोग्राम वजन उठाने में सफल हो जाते, तो उनके पास सिल्वर या गोल्ड मेडल जीतने का भी मौका था।

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संघर्ष की मिसाल हैं झंडू कुमार

झंडू कुमार की सफलता केवल एक पदक की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की मिसाल है। बिहार के हरनौट के रहने वाले झंडू जब मात्र 5 वर्ष के थे, तब उन्हें पोलियो हो गया था। इस बीमारी के कारण उनके दोनों पैर प्रभावित हो गए और वे जीवनभर के लिए दिव्यांग हो गए।

आर्थिक तंगी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। परिवार का गुजारा चलाने के लिए उन्होंने सब्जियां बेचीं, बाद में ई-रिक्शा चलाकर भी परिवार की मदद की। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी फिटनेस और कसरत जारी रखी।

इसी दौरान बिहार के एक खेल अधिकारी ने उनकी शारीरिक क्षमता को देखते हुए उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग अपनाने की सलाह दी। यही सलाह उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। हालांकि खेल में आगे बढ़ने के दौरान भी आर्थिक संकट उनका पीछा नहीं छोड़ सका। राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए उन्हें अपना ई-रिक्शा तक बेचना पड़ा।

देश के लिए रचा इतिहास

सालों की मेहनत, संघर्ष और कठिन परिस्थितियों को मात देकर झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए पहला पदक जीतकर इतिहास रच दिया। उनका यह ब्रॉन्ज मेडल न केवल भारत की पदक तालिका का आगाज है, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए भी प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।

झंडू कुमार की यह उपलब्धि साबित करती है कि मजबूत इरादों और कड़ी मेहनत के सामने कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। उनका संघर्ष और सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

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Author: Khabri Chai

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