बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सर्विस टैक्स की बकाया वसूली से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी प्रोपराइटरशिप फर्म के मालिक की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों से मृतक की कर देनदारी की वसूली नहीं की जा सकती, यदि संबंधित कानून में इसके लिए कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान मौजूद नहीं है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि कर निर्धारण (Assessment) और मांग आदेश (Demand Order) मालिक के जीवित रहते पारित हुए थे, विभाग मृतक के वारिसों के खिलाफ रिकवरी कार्रवाई नहीं कर सकता।
यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे की एकलपीठ ने भिलाई निवासी देवन अनीषा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने 13 दिसंबर 2024 को जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग द्वारा जारी रिकवरी और गार्निशी नोटिस को निरस्त कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता देवन अनीषा के पति स्वर्गीय महेंद्रन रूपेश नायडू अपने नाम से एम/एस महेंद्रन रूपेश नायडू नामक प्रोपराइटरशिप फर्म संचालित करते थे और सब-कॉन्ट्रैक्टर के रूप में कार्य करते थे।
जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग ने वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए 12 अक्टूबर 2018 को उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया था। जांच के बाद 30 जून 2020 को पारित आदेश में विभाग ने 10 लाख 74 हजार 919 रुपये सर्विस टैक्स की मांग की। इसके साथ ही इतनी ही राशि का जुर्माना भी लगाया गया। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील भी बाद में खारिज हो गई।
इसी बीच 3 मई 2023 को महेंद्रन रूपेश नायडू का निधन हो गया। इसके बाद विभाग ने 13 दिसंबर 2024 को उनकी पत्नी देवन अनीषा और उनके बैंक खातों के खिलाफ फाइनेंस एक्ट, 1994 की धारा 87(बी) तथा सीजीएसटी एक्ट की धारा 142 के तहत गार्निशी और रिकवरी नोटिस जारी कर दिए।
याचिकाकर्ता की ओर से क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीलाभ दुबे ने अदालत में तर्क रखा कि प्रोपराइटरशिप फर्म की कोई अलग कानूनी पहचान नहीं होती। फर्म और उसका मालिक एक ही कानूनी इकाई माने जाते हैं। इसलिए मालिक की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत कर देनदारी स्वतः उसके कानूनी वारिसों पर नहीं डाली जा सकती।
उन्होंने यह भी कहा कि फाइनेंस एक्ट, 1994 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो मृतक करदाता के कानूनी वारिसों से सर्विस टैक्स की वसूली की अनुमति देता हो। इसलिए विभाग की कार्रवाई पूरी तरह अवैध है।
विभाग ने क्या कहा?
विभाग की ओर से दलील दी गई कि कर निर्धारण और मांग आदेश महेंद्रन रूपेश नायडू के जीवित रहते पारित किए जा चुके थे। इसलिए विभाग बकाया कर की वसूली उनके कानूनी वारिसों से करने का अधिकार रखता है और रिकवरी नोटिस वैध है।

हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट के “शबीना अब्राहम बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज एंड कस्टम्स” मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि सेंट्रल एक्साइज एक्ट और फाइनेंस एक्ट में ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है, जिसके तहत किसी मृत करदाता की कर देनदारी उसके कानूनी वारिसों से वसूली जा सके।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कानून में ऐसी व्यवस्था ही नहीं है, तब विभाग कानूनी वारिसों के खिलाफ रिकवरी या गार्निशी नोटिस जारी नहीं कर सकता। किसी भी कर देनदारी को केवल प्रशासनिक कार्रवाई के आधार पर वारिसों पर नहीं थोपा जा सकता।
कोर्ट का अंतिम आदेश
हाई कोर्ट ने 13 दिसंबर 2024 को जारी सभी रिकवरी और गार्निशी नोटिस रद्द कर दिए। साथ ही विभाग को निर्देश दिया कि मृतक महेंद्रन रूपेश नायडू की सर्विस टैक्स देनदारी की वसूली के लिए उनके कानूनी वारिसों के विरुद्ध इस आधार पर कोई कार्रवाई न की जाए कि वे मृतक के उत्तराधिकारी हैं।
इस फैसले को प्रोपराइटरशिप फर्मों और कर विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कर वसूली की कार्रवाई केवल कानून में उपलब्ध स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही की जा सकती है, न कि अनुमान या प्रशासनिक विवेक के आधार पर।
Author: Khabri Chai
Khabri Chai news portal.




